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Wednesday, September 26, 2012

मंदबुद्धि इंजिनियर



खिलौने तोड़ता था
उन्हेँ जोड़ता था
यहीं थी उसकी जिंदगी
इन्हीं में कपार फोडता था
दराज टुकडों से पटी
ना जाने कितनी दुर्घटनाएं घटी
लड़का होशियार था
बस creativity का शिकार था


इंजिनियर बनने की चाह
पकड़ीं सही राह
भौतिकी में की जादूगरी
रसायन में बाजीगरी
विविध शास्त्रों से खेलने लगा
दिन ब दिन नये तार छेड़ने लगा
प्रयोग कुछ होगए सफल
कुछ रह गए अफसल
कहता समंदर की लहरों पे सपने तैराऊंगा
उन्ही से बिजली बनाऊंगा


जब उसे आया
स्विंग टाइप जेनरेटर बनाने का आईडिया
प्रोफेसर से बात की
उसने उसे H.O.D के पास दिया
H.O.D ने समझाया
व्यर्थं में ना समय गवाओं
किताबे रटो और मार्क्स लाओ
कॉलेज को नहीं चाहिए था कोई innovator
उनकी मांग थी ज़्यादा मार्क्स वाला
मंदबुद्धि इंजिनियर


साथियों ने छेडा
ये बनेगा मोहन भार्गव स्वदेस का
पानी से बिजली बनाएगा
भाग्य रोशन करेगा प्रदेश का
अभी जख्म नहीं हुए थे heal
तभी Semester ने ठोक दी आखिरी कील


ख्वाब उम्मीद और ज़ज्बा
सब year drop में बह गया
Innovation ढह गया
बस मंदबुद्धि इंजिनियर रह गया
फिर सिर्फ किताबे रटी
ज़िंदगी बस इम्तिहान तक सिमटीं


उसने भी ले ली
मंदबुद्धि इंजिनियर की डिग्री
जिन हाथों में ताकत थी
डोर खीचने की
अब वो रह गयी बस कठपुतली
मैंने भी आखिरकार ले ली
मंदबुद्धि इंजिनियर की डिग्री

Another wonderful guest post from shashi Prakash.

7 comments:

  1. i am in the second year , so saying i can relate to it would be injustice, but it's all true !!

    i like the poem

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  2. I loved this poem-very well expressed.It is so sad that innovation in India is stifled ruthlessly.

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    1. The Credit goes to shashi who brought up this !

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  3. The very first para touched the chord....and this went till the last.

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  4. आप सभी को मंदबुद्धि इंजीनियर पसंद आई
    इस के लिए ह्रदय से आभार

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  5. Ah, the corridors of an engineering college. Thank God I escaped them.

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