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Saturday, June 15, 2013

मन के लिए कविता हैं

नमस्ते 
  • मन के लिए कविता हैं
    वो पूछते हैं
    कविताओ मे क्या हैं
    पैसा हैं ईनाम हैं
    या नाम हैं बहुत
    रोटी मिलेगी घर चलेगा
    चूल्हा जलेगा
    भूख मिटाएगी कविता
    या प्यास बुझाएगी कविता
    प्रियशी के लिए तोहफे मे
    क्या लाएगी कविता
    मै मानता हूँ
    ये रोटी और दाल नहीं देगी
    तन पे कपड़ा
    पसीना पोछने को रुमाल नहीं देगी
    वैसे तो मै भी कमा लेता हूँ
    चार पैसे
    दौड़ता हूँ खटता हूँ
    धूल खाता हूँ
    बरसात भीगता हूँ
    दुनिया समझती हैं मशीन मुझे
    सुबह मशीन बन
    पेट की खातिर
    ईंधन जुटाता हूँ
    रात कविता करता हूँ
    इंसान हो जाता हूँ
    जैसे तन के लिए रोटी सुविधा हैं
    मन के लिए कविता हैं


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किताब को अधिक अधिक लोगो तक पहुचाने का प्रयास कर रहा हू , इस में आप का भी सहयोग चाहता हू , अगर हो सके तो आप अपने फेसबुक पेज या मित्रों में शेयर करे 
मै आपका आभारी रहूँगा
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PS : This is a guest post from shashiprakash saini for the promotion of his free ebook of hindi poetry enjoy !!